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..तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है..

तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है
चरण रज-शीश नवाने को जी चाहता है
जो सुकून है तेरे दामन में ' ए ' मौला
उस सुकून के आलिंगन को जी चाहता है
तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है...।।
घनघोर निशा, विरही दशा अब मिटा चाहता है
तेरे नूर ' ए ' हुस्न के दीदार का समां चाहता है
विकल तन-मन तेरे स्पर्श से सहलना चाहता है
हताशा - निराशा से उबरने को जी चाहता है
तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है...।।
मारा-मारा फिरा पाना अब नसीहत चाहता है
तुझे अमर - प्रणय की बख़्सियत चाहता है
दिल बड़ा बे-अदब है,पाना अब सजा चाहता है
तेरे इश्क़ की........इंतेहा चाहता है
तेरे दर पे आने को जी चाहता है...।।
तुम बिन ये एकाकी जीवन
होना तेरा हमनवा चाहता है
तुझमें खोकर तूझसा होकर
तेरे इश्क का नशा चाहता है
मैली मेरी 'चदरिया' तेरी
रूहानी नजरों से धुला चाहता है
' ए ' रंगरेज पिया !
तेरे सतरंगी रंगों से मन रंगा चाहता है
तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है
तेरे ' दर ' पे आने को जी चाहता है...।।
©Vijayvirat