बिजली ठेका कर्मियों को बेजुबान कहा जाए कम है
आज इनकी समस्या सुनता कौन है बेजुबान,मजदूर है
दर्द पीड़ा मौसम तंग हाल कोई बेअसर सी है जिंदगी
खुद को अंधेरे में रखता उजाले को तलाशने में कर्मी
धर्म इतना है कि बोलता नहीं अपनी पीड़ा बताता है
मगर पीड़ा को सुनता कोई नहीं बेजुबान है मजदूर
संगठन हजार बने मगर इनकी पीड़ा को सुनता नहीं है
एक मई को मजदूर दिवस मनाते हैं मजबूर वो आज
तेरी पीड़ा को समझना हर किसी दिल की बात नहीं
तुम्हारी पीड़ा को समझा तो बाबा साहब ने हक दिया
पूंजीपति ने काम लिया श्रम का भुगतान नहीं किया
लगता है ऐसे जैसे मजदूर दिवस नहीं मजबूर दिवस है
घर को तुमने रोशन कर दिया रोशन चिराग की खोज
दिल में बस तुम्हारी यादें रह जाती हैं शहादत के बाद
कुछ हादसे आंसू रोक नहीं पाते और कुछ छोड़े नहीं
बस इतना है कि तुम्हारी मेहनत का फल विकास है
ऊंची अटारी हो या देश की प्रकृति तेरे हाथों के श्रम
छोटी हो या बड़ी इमारत तेरे श्रम की ऊंचाई है इसमें
हर कोई लगाता है बोली तेरे श्रम कि तुम मेहनती हो
तुम मान सम्मान के भूखे हो और अपनी मजदूरी के
कौड़ी के दाम में खरीद ली जाती है तुम्हारी मेहनत
व्यापारी वसूलते है लाखों रुपए तेरे मेहनत मजदूरी
©lawnishtha
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