की बेवक़्त देखे तो शीशा भी अब हमे छेड़ता है, मेरे जिस्म से खुशबू भी अब तेरी आने लगी है, और तुम कहते हो ये इश्क़ नहीं है।
लगा कर आग मेरे सीने तुम बात तमाशे की करते हो; देकर नसीहत मुझे तुम बात इनकार की करती हो, ये इश्क़ नहीं तो क्या है, कि मुझे ठुकरा कर भी चाहते पाने की करती हो।
मेरी बाहों में लिपट कर कहां बाते तुम दूर होने की करती हो, गले लगाने जो हम तुम्हे आते है तो पकड़ कर हाथ मेरा तुम भी कहां मना करती हो।
बाते जो मैं करू दूर होने की तो तुम ही तो अपने मासूम हाथों से मेरे होठों को सीं देती हो, और तुम कहते हो की ये इश्क़ नहीं है।
©rishab
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