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उदयाचल

"उदयाचल"
जब मौत की ललकार हो,
दिन-प्रतिदिन प्रहार हो,
कंपन से शुन्य पड़े श्रोत पर भी विजय गीत बजाए रखना
अमर,चिरंजीव उदयाचल से पहले तुम ना थकना।
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रोम रोम में असीम पीड़ा जगे,
जब ये धरा मृत्यु भूमि लगे,
उमंग,उद्दंड,पराक्रम और मुस्कुराहट जैसे अस्त्र-शस्त्र स्वयं में सजाए रखना
अमर,चिरंजीव उदयाचल से पहले तुम ना थकना।
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पट तमाम बंद मिले,
पराजय का पुष्प खिले,
विजय इत्र की सुगंध प्रत्येक छिद्र में फैलाए रखना
अमर,चिरंजीव उदयाचल से पहले तुम ना थकना।
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हार जब प्रचंड हो,
श्वास गति मंद हो,
भय को महान शस्त्र मुस्कान से भ्रमित कर उलझाए रखना
अमर,चिरंजीव उदयाचल से पहले तुम ना थकना।
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ललाट पर स्वेद हो,
मौत को खेद हो,
इसी ऊर्जा को रोम-रोम में जीवनपर्यंत यूंही सदा जगाए रखना
अमर,चिरंजीव उदयाचल से पहले तुम ना‌ थकना।
अमर.................
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