ये जंग है?
सत्य और अन्वेषण की
जो विह्वल मन
और चेतना की
दूरियों को गहरा रही है...
कितना स्याह है जीवन
बतला रही हैं.....
शाायद कहीं कहीं से
रिस रही हैं
उम्मीदों की छतें
जहाँ छतें पक्की हैं
वहाँ अधूरे ख़वा्ब
रिस रहे हैं......
पत्थर ज़िँदा हैं
इन्सान मुर्दा हैं....
क्यूँकि वे जानते हैं
कितना भी कटु क्यूँ न हो?
सत्य सदैव सत्य रहता है......
अभिनेश ‘अनुभव’
©abhinesh
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