आज दुआ को तो हमने सिर झुकाया भी ना था ,
फिर भी सौ जन्नत यूँ ही बस नसीब हो गये ।
दीदार नजरों का हुआ लफ्ज पर पहरा था,
लुट गए हम तो पल में गरीब हो गए। ।
उनकी नजरे नहीं थी,है हमको यकीन ,
वो तो सागर सी गहरी थी, तारों सी थी
कभी उठ के गिरी कभी गिर के उठीं,
वो तो बसंत की मस्त बहारों सी थीं। ।
हम तो घर का ठिकाना ही भूल गए,
तेरी नजरों के ख्याल में मशगूल हो गए,
तेरी सूरत ना देखी कोई ग़म नहीं,
सारे सजदे मेरे जो आज कुबूल हो गए। ।
©calmvalley
C