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उपकार मेरा है तुम रुक जाओ मुझ पर प्रहार न कर

उपकार मेरा है तुम रुक जाओ मुझ पर प्रहार न कर
मेरे कुछ बात समझ आती है या यूं ही चले जाते हो
मेरे दिल में प्रकृति के प्रति जो अपार प्रेम है न छीने
फल पुष्प अनाज खाद श्वास मेरे उपकार तुझ पर है
मैंने तुम्हारी सेहत को बनाए रखा सदियों से अब तक
मगर तेरे हृदय में अभी भी प्रकृति के खिलाफ नफरत है
आखिर तेरे हृदय में इतनी नफरत क्यों है मेरे खिलाफ
तुझे जीने को मैंने ऑक्सीजन दी और खाने को भोजन
रहने को आसरा और प्रकृति का अतुल्य प्रेम तुझको दिया
मगर तेरे हृदय में आज भी नफरत क्यों है प्रकृति के लिए
सदियों से तुझे पाला है और तूने ही मेरे घर को उजाड़ा है कहा था तुझे संभल जाने को मेरे अंदर रहस्य छुपे रहते हैं उन रहस्य को तू ना खदान कर अगर प्रलय हुआ तू जान
जानते हुए खिलाफत तुम करता है मैं प्रकृति हूं और मां
मैंने तुझे जन्म दिया है इस सृष्टि में स्वर्ग की तरह रहने को
मगर तेरी इच्छा है अभी भी प्रकृति के खिलाफ है तू नादान
मानव मेरे खिलाफत के हसरत तेरा बुरा हाल होगा जान ले
कोशिशें कर तू ना काम नहीं होगा तुझे हजारों खुशियां हैं
मेरे अल्फाजों को संभाल कर रखना यही तेरी जिंदगी की
अल्फाजों में सजाई है मैंने यह दुनिया तू भी संभाल रख
©lawnishtha