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विद्यासागर जी महाराज

*राष्ट्रसंत संत शिरोमणि विद्यासागर जी महाराज*
६ सन्तानों में है ये (अ)द्वितीय
जीवन रहा इनका अनुकरणीय
बेलगाम जिले का था सदलगा ग्राम
शरद पूर्णिमा को हुआ बालक महान
विद्याधर जी का अष्टगे था उपनाम
प्यार से पीलू रखा था माँ-पिता ने नाम
शांतिसागर जी का जब किया था दर्शन
तब उम्र इनकी थी मात्र 9 साल
मन मे हुआ वैराग्य का उद्गम
और पकड़ ली ब्रह्मचर्य की चाल
स्कूली शिक्षा हुई भले 9वीं तक
गुरुकुल शिक्षा ग्रहण करी
अपनाया जीवन मे कड़ा अनुशासन
भाषाओं पर महारथ सी जादूगरी
प्रकृत, संस्कृत, कन्नड़, मराठी, अंग्रेजी, बांग्ला के हैं ये प्रवीण ज्ञाता
मूकमाटी, नर्मदा का नरम कंकर ग्रंथों के हैं ये रचियता
छंदशास्त्र, दर्शन, अध्यात्म के हैं आचार्यश्री प्रकाण्ड विद्वान
पक्षी जैसे स्वच्छंद, चट्टान जैसे अविचल, नदी जैसे प्रवाहमान
सुकोमल व्यक्तित्व में है समता, ओजस्वी और माधुर्य पूर्ण है वाणी
तपस्या की जीवंत मूर्ति, कठोर साधक का नही कोई सानी
तन्मयता से गुरुवर सेवा की, धर्म का चिंतन-मनन किया
22 की युवावस्था में गुरुकृपा से आचार्य पद सुशोभित किया
साइटिका से रुग्ण है शरीर
जीवों हेतु सदा करुणा है पलती
इनके अद्भुत ज्ञान के आगे
विद्वानों की एक न चलती
शीत, ताप, वर्षा के झंझावात से
होता तनिक न कोई प्रभाव असर
सम्यक दृष्टि के इस योगी ने छोड़े सांसारिक मिथ्या और आडम्बर
इनके आशीर्वाद से खुले कई जिनालय,
यात्री निवास और औषधालय
वितरित कराए कृतिम अंग
खुलवाकर विकलांग शिविर और कई गौशालाएँ
हज़ारों पशुओं को दिया गौशालाओं से संरक्षण
शिविरों में होता अंगों का प्रत्यारोपण और ऑपरेशन
वीतराग का किया मार्ग-प्रशस्त
जिससे बने आध्यात्मिक जीवन
दर्शन मात्र से मिले प्रेरणा नई
और होता उल्लास का संचरण
शोर-शराबों से कोसों दूर
तीर्थों पर करते चातुर्मास
चकाचोंध के बिना ही ये अचानक कर जाते प्रवास
व्याप्त कुरीतियों का इन्हें है बोध
सब समस्याओं का है समाधान
प्रवचन प्रमेय, गुरुवाणी काव्य इनके सुनलो
नतमस्तक होकर गुरुदेव को प्रणाम🙏🙏
संत शिरोमणि आचार्यश्री विद्यासागर जी के चरणों मे नमोस्तु, वंदन
: - पंकज जैन
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