विरह की वेदना

जब प्रेम दीपक से दूर, विरह की रात बहुत लम्बी,
एक पल सदियों सा भारी, यादें करतीं तन्हाई गहरी।

दिल के कोने में उम्मीदों की लौ,
उसी प्रेम में खोजूँ जीने का कारण व दाऊ।

विरह की वेदना, प्रेम की सीमा को पार कर जाती,
हर एक पल, एक दूजे की याद में गुज़ारा जाता।

प्रेम भी क्या विचित्र खेल, विरह के बिना अधूरा,
एक दूसरे की कमी, ही तो सच्चा प्रेम पुख्ता करता।

पर फिर भी खिंच वापस चले आते, तोड़ के सब बंधन,
प्रेम में ही सच्ची शक्ति, बिन शब्दों के समर्पण।