प्रेम ने बिना आवाज़ के ही,
दिल के तारों को छेड़ा।
विरह ने आकर इसे,
एक अलग ही ताल दिया।
जहाँ प्रेम ने पुष्प बोए,
विरह ने उन्हें मुरझाया।
लेकिन इसी मुरझाए हुए में,
एक नई आस ने जन्म लिया।
प्रेम की मिठास में,
विरह का तीखापन।
आँखों की नमी में छुपा,
दोनों का संगम अद्भुत स्वर्णिम।
यह विरह की पीड़ा ही तो है,
जो प्रेम के अर्थ को गहरा करती।
और शायद इसी सच में,
प्रेम और विरह, दोनों अदब से सर झुकाते।