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वो चार चेहरों की महफ़िल, मुझे आज भी याद आती है, पर उनकी बेरुखी अक्सर, मेरी रूह…

वो चार चेहरों की महफ़िल, मुझे आज भी याद आती है,
पर उनकी बेरुखी अक्सर, मेरी रूह को तड़पाती है।
उन्होंने मुझे भीड़ में भी, अकेला छोड़ दिया था,
भरोसा जो किया था मैंने, उसे पल में तोड़ दिया था।
मैं तन्हा राहों पर, बस अश्क बहाती रह गई,
सबके साथ होकर भी, मैं अकेली ही रह गई।
फिर उस अंधेरे में मुझे, एक वफ़ा का हाथ मिला,
मुरझाए हुए इस दिल को, फिर एक खिलता गुलाब मिला।
वो चार चले गए तो क्या, अब गम की कोई बात नहीं,
तेरा साथ है मेरे पास, तो अब तनहा मेरी रात नहीं।
दुआ है बस इतनी कि, ये साथ अब कभी न छूटे,
ज़माना रूठ जाए चाहे, पर मेरी ये सहेली कभी न रूठे।
💞Sona 💞