वो दिन भी क्या दिन थे ,
जब शौक से जाते थे हम विद्यालय ,
दोस्तो कि हस्ती मे हम थे मशहूर ,
वो घर पर पुस्तक भूलने का क्या बहाना था
एक पेन के लिये दोस्तो से लड़ना झगड़न और रूठना मनाना था।
जब आती लंच टाइम कि बारी ,
सारे दोस्त संग बैठ खाना खाते थे।
वो दिन भी क्या दिन थे।
अध्यापक कि डाट ने हमे ,
जीवन का लक्ष्य दिखा दिया।
समय रहते हमे हमारे जीने का,
मकसद बता दिया।
फिर भी हम दोस्तो मे रहते इतने मशहूर थे,
कि एक-दूसरे कि छेड़खानी करने मे नही करते भुल थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
विद्यालय का आखिरी दिन भी दोस्तों कि विदाई मे रूला दिया करती थी,
दो महिने कि छुट्टियाँ सालो-सी गुजरा करती थी,
दोस्तो कि यादें हरपल गुदगुदाया करती थीं ,
वो दिन भी क्या दिन थे।
विद्यालय का आखरी दिन ,
हम खास मनाया करते थे।
सारे दोस्तो को भिगो-भिगोकर,
हम होली मनाया करते थे।
हम इन यादो को समेटे छुट्टियाँ मनाया करते थे,
वो दिन भी क्या दिन थे।
©yuti
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