“वो सिर्फ लड़की है”
ये कैसी दुनिया है,
जहाँ जन्म से पहले ही
किसी की किस्मत तय कर दी जाती है।
जहाँ एक मासूम सी ज़िंदगी
सिर्फ “लड़की” होने की वजह से
एक सवाल बन जाती है।
बचपन से ही उसे सिखाया जाता है
कि चुप रहना ही उसकी पहचान है,
उसकी हँसी, उसकी ख्वाहिशें
धीरे-धीरे कहीं खो जाती हैं।
उसके सपनों को अक्सर
“ज़िम्मेदारियों” के नाम पर दबा दिया जाता है,
उसकी उड़ान से पहले ही
उसके पर कतर दिए जाते हैं।
वो सबके लिए जीती है,
पर खुद के लिए जीना
उसे कभी सिखाया ही नहीं जाता।
हर मोड़ पर उसे परखा जाता है,
हर बार उसे ही समझौता करना पड़ता है,
फिर भी उसकी ताकत को
कभी समझा ही नहीं जाता।
वो टूटती भी है,
पर फिर खुद ही संभल जाती है,
क्योंकि वो जानती है—
उसे रुकना नहीं, आगे बढ़ना है।
वो सिर्फ लड़की नहीं,
एक पूरी दुनिया है,
जो चुप रहकर भी
सब कुछ सह जाती है।