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याद आया फिर वही ठिकाना दिल का ।

याद आया फिर वही ठिकाना दिल का
गुंजे थे मन मंदिर में जहाँ तराना दिल का।
कभी शाम होने की जिन्दगी में भनक न थी
जुगनूऐं रौशन कर रही थी आशियाना दिल का।
रूठने की अदा भी न थी मालूम उनको
होश आया तो कह दिया गफलत है दिवाना दिल का।
थी जल रही चिराग-ऎ-मुहब्बत-ऎ-रूह मूसलसल
क्या खूब था मिलने का बहाना दिल का।
अपनी हसरतों को जिंदा रख न पैदा कर खलिश
आरजू यहीं है बस इस बेगाना दिल का।
हर शय की मुखबिर नहीं मुखातिब हैं अनुराग
डर न जाहिर कर दे सामने अफसाना दिल का।
©anuragrahi
©Anuragrahi