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यह चुप शाम धीरे से उतर आई, सूरज की थकी किरणें घर लौट आई। हवा ने भी आज कुछ कहा…

यह चुप शाम धीरे से उतर आई,
सूरज की थकी किरणें घर लौट आई।

हवा ने भी आज कुछ कहा नहीं,
बस खामोशी ने अपनी बात दोहराई।


पेड़ों की छांव लंबी हो गई,
जैसे यादें खुद से मिलने आ गई।

पंछियों की आवाज थम सी गई,
दिल की धड़कन थोड़ी साफ सुनाई।

ना कोई शिकायत ना कोई सवाल,
बस वक्त ने खुद से आंखें मिलाई।


उस चुप शाम में इतना कुछ था,
जो बिना कहेआत्मा को छू आई।