शून्य कमरे में मेरी परछाईं
सिर्फ दीवारें, मौन साक्षी
हर कोने में बिखरी चुप्पी
शब्दों से भी दूर मची रही
उँगलियाँ छूती खाली दरारें
आँखें भटकती किसी अनजान पार
सपनों के टुकड़े बिखरे हुए
मन की राहों पर अकेले झूले
कभी हँसता, कभी रोता
अकेलापन मेरा साथी होता