यहाँ एक कविता है "अकेलापन" पर:

शून्य कमरे में मेरी परछाईं
एक अजीब सी चुप्पी समाई

दीवारें मौन, खिड़की भी बंद
कोई न पुकारे, कोई न समझे मेरा दुख-फंद

उँगलियाँ पड़ी हैं बिखरी हुई
जैसे किसी ने मुट्ठी खोली हुई

सिर्फ मेरी सांसें हैं गवाह
इस मौन के, इस अकेलेपन का राज