शून्य कमरे में मेरी परछाईं
एक अजीब सी चुप्पी समाई
दीवारें मौन, खिड़की भी बंद
कोई न पुकारे, कोई न समझे मेरा दुख-फंद
उँगलियाँ पड़ी हैं बिखरी हुई
जैसे किसी ने मुट्ठी खोली हुई
सिर्फ मेरी सांसें हैं गवाह
इस मौन के, इस अकेलेपन का राज
शून्य कमरे में मेरी परछाईं
एक अजीब सी चुप्पी समाई
दीवारें मौन, खिड़की भी बंद
कोई न पुकारे, कोई न समझे मेरा दुख-फंद
उँगलियाँ पड़ी हैं बिखरी हुई
जैसे किसी ने मुट्ठी खोली हुई
सिर्फ मेरी सांसें हैं गवाह
इस मौन के, इस अकेलेपन का राज