शून्य कमरे में मेरी परछाईं
टहलती है, बिखरी हुई
कोने में रखी एक कुर्सी
मौन गवाह मेरी निःसंगता का
दीवारें सहेजती हैं चुप्पी
मेरे शब्द रहते हैं अनकहे
बाहर बारिश की बूँदें
अंदर मेरी आँखों में छलकती
अकेलापन, मेरा मौन साथी
जैसे परछाईं, मेरे पीछे चलता
शून्य कमरे में मेरी परछाईं
टहलती है, बिखरी हुई
कोने में रखी एक कुर्सी
मौन गवाह मेरी निःसंगता का
दीवारें सहेजती हैं चुप्पी
मेरे शब्द रहते हैं अनकहे
बाहर बारिश की बूँदें
अंदर मेरी आँखों में छलकती
अकेलापन, मेरा मौन साथी
जैसे परछाईं, मेरे पीछे चलता