यहाँ एक कविता है "अकेलापन" पर:

शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है मौन, बिखरी हुई

सन्नाटे के कोने में दबी
एक अनकही आहें रुकी हुई

दीवारें हैं गवाह मेरे
मौन संवादों के अकेलेपन की

कभी कोई स्पर्श न होता
इस निर्जीव वेदना में

आँखों में छुपा है एक समंदर
जिसमें डूबती हर आस मेरी