यहाँ एक कविता है "अकेलापन" पर:

शब्द नहीं, मौन है मेरा साथी
दीवारें हैं, पर कोई नहीं याद आती

खाली कमरे में गूँजती सन्नाटे की आवाज
एक परछाईं हूँ मैं, बिन रंग, बिन लाज

उँगलियाँ फिसलती हैं किताबों के पन्नों पर
कभी किसी ख्याल में, कभी किसी पन्ने पर

दूर तक फैला है निस्तब्ध अकेलापन
चाहता हूँ छू लूँ, पर छू नहीं पाता कण-कण