शून्य कमरे में मेरी परछाईं
सीधी दीवारों से टकराती
कोई आवाज नहीं, कोई स्पर्श नहीं
मौन में मन की व्यथा जागती
सैकड़ों लोगों में भी अकेला
किनारे खड़ा, एक अजनबी सा
चुप्पी के समंदर में डूबा
हर सांस एक अनकही सी
शून्य कमरे में मेरी परछाईं
सीधी दीवारों से टकराती
कोई आवाज नहीं, कोई स्पर्श नहीं
मौन में मन की व्यथा जागती
सैकड़ों लोगों में भी अकेला
किनारे खड़ा, एक अजनबी सा
चुप्पी के समंदर में डूबा
हर सांस एक अनकही सी