यहाँ एक कविता है "अकेलापन" विषय पर:

शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है निःशब्द, बिना किसी आस

दीवारें हैं गवाह मौन व्यथा के
हर कोने में बसता एक उदास

कभी किसी से मिलता नहीं संवाद
कभी किसी से नहीं मिलती आस

मुट्ठियाँ भींच लेता हूँ मौन में
टूटते हुए सपने, रिमझिम आँसू