यहाँ एक कविता है "अकेलापन" विषय पर:

शून्य कमरे में बैठा हूँ
मौन की दीवारों के बीच

किसी की आवाज नहीं
बस मेरी सांसों का संगीत

खिड़की से झांकता हूँ बाहर
लोग मिलते, हंसते, जुड़ते

मैं यहाँ अकेला
एक परछाईं की तरह

शब्द हैं मेरे पास
पर कोई सुनने वाला नहीं