अकेलेपन की चादर
ओढ़ता हूँ रात-दिन
मौन कमरे में बैठा
सुनता हूँ मन की धुन
कभी खिड़की से झाँकता
कभी दीवार से मिलता
शब्द बिखरे हैं चारों ओर
कोई नहीं सुनता मेरी पुकार
अकेलेपन की चादर
ओढ़ता हूँ रात-दिन
मौन कमरे में बैठा
सुनता हूँ मन की धुन
कभी खिड़की से झाँकता
कभी दीवार से मिलता
शब्द बिखरे हैं चारों ओर
कोई नहीं सुनता मेरी पुकार