यहाँ एक कविता है "अकेलापन" विषय पर:

अकेलेपन की चादर
ओढ़ता हूँ रात-दिन

मौन कमरे में बैठा
सुनता हूँ मन की धुन

कभी खिड़की से झाँकता
कभी दीवार से मिलता

शब्द बिखरे हैं चारों ओर
कोई नहीं सुनता मेरी पुकार