यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है, बिना किसी साथी

दीवारें सुनी, खिड़की भी मौन
एक कोना जैसे करता रोने का इंतज़ार

मेरी उँगलियाँ छूती हैं खालीपन को
जैसे कोई अनकही दर्द हो

कभी-कभी सांसें भी
एकाकी महसूस होती हैं