यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

अकेलेपन की शाम

सन्नाटे में मौन खड़ा
मेरा अकेलापन बोलता है
हर कोने में गूँजती आवाज
किसी से न मिलती, डोलता है

दीवारें साक्षी, खामोश कमरा
एक पल में लगता अनंत सा
आँखों में भरी अधूरी आस
मन का व्यथा-भरा संसार

शब्द हैं पर कोई सुनने वाला नहीं
स्पर्श है पर कोई छूने वाला नहीं
अकेलेपन की यह मौन चादर
धीरे-धीरे मुझे ढँक लेती है