शून्य कमरे में मेरी परछाईं
एक अजनबी सी चुप्पी
दीवारें सिमटती हैं धीरे-धीरे
मौन साक्षी मेरी अकेली पुकार
कभी किसी की याद, कभी खामोशी
बिखरे शब्द, बिना संवाद
आँखों में एक अनकही दास्तान
हाथों में बस एक अकेलापन
शून्य कमरे में मेरी परछाईं
एक अजनबी सी चुप्पी
दीवारें सिमटती हैं धीरे-धीरे
मौन साक्षी मेरी अकेली पुकार
कभी किसी की याद, कभी खामोशी
बिखरे शब्द, बिना संवाद
आँखों में एक अनकही दास्तान
हाथों में बस एक अकेलापन