यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

शब्दों के बीच खोया हुआ अकेलापन

मौन कमरे में बैठा हूँ
सन्नाटे की दीवारों से छेड़ते हुए
किसी अनकही बातों को

याद आते हैं चेहरे
जो कभी करीब थे
अब दूर, बहुत दूर

उँगलियाँ स्क्रीन पर फिसलती हैं
संपर्क की उम्मीद में
पर रिश्ते बस नंबरों तक सीमित

अकेलापन एक ऐसी छाया
जो साथ चलती है
पर कभी छूती नहीं