शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है निस्तब्ध, बिना किसी आस पाई
दीवारें चुप, सन्नाटा गहरा
मौन में भी चीखता एक अकेलापन डेरा
कभी झिलमिलाती याद, कभी बुझती आँखें
बिखरी हुई खामोशी में टूटती पलकें
शब्द नहीं, सिर्फ सांसें भरती हूँ
अपने ही अंतर में मैं डूबती हूँ