यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

मौन कमरे में बैठा हूँ

शब्दों की दीवारें घेरे हुए
कोने में टिकी है एक परछाईं
जो मुझसे भी अधिक अकेली है

सन्नाटे में गूँजती हैं
मेरी सांसें
जैसे कोई अनकही कहानी

किसी को याद करता हूँ
किसी को भूलता हूँ
और फिर खुद में सिमट जाता हूँ

अकेलापन मेरा मित्र
कभी रुलाता, कभी मुस्कुराता
एक अजीब सी छाया सा