यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

अकेलेपन की चादर

शब्द नहीं, मौन है चारों ओर
खाली कमरे में गूँजती निस्तब्धता

दीवारें साक्षी, मेरी आँखें गवाह
किसी से मिलने की आस अधूरी

सुनसान राहों पर चलता हूँ अकेला
हर कदम पर बोझ, हर पल पराया

आवाज़ें हैं, पर स्पर्श नहीं
रिश्ते हैं, पर संबंध नहीं

अकेलापन - एक ऐसी छाया
जो मुझे ढके, फिर भी न ढँके