यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है निस्तब्ध, बिना किसी आस पास

दीवारें करती हैं मौन बातें
मन के अंतर्गत छुपी व्याकुल चाहतें

कभी-कभी खिड़की से झाँकता है
एक अकेला पंछी, मेरे जैसा

शब्द हैं पर किसी को नहीं सुनाते
सपने हैं पर किसी को नहीं मिलाते