शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है निस्तब्ध, बिना किसी आस पास
दीवारें करती हैं मौन बातें
मन के अंतर्गत छुपी व्याकुल चाहतें
कभी-कभी खिड़की से झाँकता है
एक अकेला पंछी, मेरे जैसा
शब्द हैं पर किसी को नहीं सुनाते
सपने हैं पर किसी को नहीं मिलाते
शून्य कमरे में मेरी परछाईं
बैठी है निस्तब्ध, बिना किसी आस पास
दीवारें करती हैं मौन बातें
मन के अंतर्गत छुपी व्याकुल चाहतें
कभी-कभी खिड़की से झाँकता है
एक अकेला पंछी, मेरे जैसा
शब्द हैं पर किसी को नहीं सुनाते
सपने हैं पर किसी को नहीं मिलाते