यहाँ एक कविता है अकेलेपन पर:

मौन कमरे में
शब्द बिखरे, बिना किसी सुनने के
दीवारें साक्षी, मेरी खामोशी की

सागर जैसा यह अकेलापन
लहरों में डूबा, फिर भी शांत
कोई किनारा नहीं, कोई संवाद नहीं

उँगलियाँ छूती हैं स्क्रीन
पर स्पर्श केवल निराला
कनेक्शन होते हुए भी अलग

मैं हूँ यहाँ
पर कहीं नहीं
अकेला, पर भीड़ में भी