अकेलेपन की छाया
शून्य कमरे में बैठा हूँ मैं
चुप्पी के साथ मेरी बातें करता
दीवारें मेरी एकमात्र साथी
मौन में मुझे सहलाता
कभी-कभी खिड़की से झाँकता
दूर क्षितिज में खोता नज़र
लोग चलते, मुस्कुराते, मिलते
मैं फिर भी रहता अकेला, असहाय, बेकल
सपने हैं मेरे, पर अधूरे
मन की गहराइयों में दफ़न
एक आवाज़ चाहता हूँ, एक स्पर्श
जो मिटा दे यह अकेलापन