अकेलेपन की परछाईं
शून्य कमरे में मेरी आँखें
ताकती हैं किसी अनजान दिशा में
चारों ओर सन्नाटा बिखरा है
जैसे मौन मेरी आत्मा का अंतर्गत स्वर
दीवारें करती हैं मेरी बातें सुन
कोई नहीं जो मुझे समझ सके
हर सांस में छुपा है एक कहानी
हर मौन में एक अनकही व्यथा
क्या यही है जीवन का सच्चा रूप
जहाँ अकेलापन बना रहे साथी
और मैं, बस एक परछाईं
जो ढूँढती रहे अपने होने का अर्थ