अकेलेपन की परछाईं
शून्य कमरे में बैठा हूँ मैं
चारों ओर सन्नाटा बिखरा
दीवारें मौन, खिड़की बंद
मन की आवाज़ गुमसुम सी
कभी किसी से मिलता नज़र
कभी किसी से टकराता मन
एक अजीब सी तन्हाई में
खोया हुआ, बिखरा हुआ
अकेलेपन की परछाईं
शून्य कमरे में बैठा हूँ मैं
चारों ओर सन्नाटा बिखरा
दीवारें मौन, खिड़की बंद
मन की आवाज़ गुमसुम सी
कभी किसी से मिलता नज़र
कभी किसी से टकराता मन
एक अजीब सी तन्हाई में
खोया हुआ, बिखरा हुआ