यहाँ एक कविता है ऋतुओं पर:

ऋतुओं का नृत्य

वसंत आती, सजाती धरती को हरियाली में
कोयल की कूक, मंद मंद मारुत के साथ

गर्मी फैलाती तपती लू की चादर
धरती दहकती, आकाश में तड़पती

बादल गरजते, मेघ नाचते मानसून में
बूँदें गिरती, पृथ्वी को भीगाते

शरद में सोनहरी पत्तें बिखरती
हवा में नाचती, मौसम की थाह लेती

हिमकाल आता, सफेद चादर ओढ़े
पहाड़ों पर बर्फ, मैदानों में कोहरा

इक मुस्कान सी ऋतुएं, जीवन के रंग
एक के बाद एक, बदलते संग