यहाँ एक कविता प्रस्तुत है:

ऋतुओं का नृत्य

बादल गरजे, बिजली चमके
वर्षा की छटा में मोर नाचे

पीले पत्ते झड़ें शरद में
हवा में सुगंध, पतझड़ की डमर

बर्फ़ की चादर ओढ़े पहाड़
सर्दी में कंपती पत्तियाँ, नाज़ुक पंखुड़ियाँ

बसंत आया, फूल महके
नए सपने, नई उम्मीदें जगे

चार रंग, चार स्वर
ऋतुओं का अनोखा संसार