यहाँ एक कविता प्रस्तुत है:

अनंत नीला विस्तार

लहरें नाचती, गाती हुई
समुद्र की गोद में खेलती हुई
कभी मीठी, कभी क्रोधित
कभी शांत, कभी विचलित

नीले अंचल में उठती-गिरती
सपनों को छूती, किनारों को चूमती
अनंत की कहानी लिखती हुई
अपनी ही धुन में मदमाती हुई