यहाँ एक कविता प्रस्तुत है:

तू दूर, मैं यहाँ

जैसे पतझड़ में पत्ता
बिछड़ा अपनी डाली से
तेरी याद में मैं झूमता
भटकता अकेले में

कभी सपनों में मिलते
कभी आँखों में रोते
प्रेम की मीठी व्यथा में
दोनों अधूरे होते

दिल की डोर जुड़ी है
पर राहें अलग-अलग
तू मेरी आस, मैं तेरा
प्रेम अनंत, पर अधर