यहाँ एक कविता "ऋतुचक्र" शीर्षक पर:

ऋतुचक्र

बदलते रंग, बदलती छटा
हर मौसम है एक नई कहा

वसंत आती, फूलों की पाली
कोयल की मीठी कूक निराली

गर्मी में धरती दहक उठे
पसीने की बूँदें बिखर उठे

मानसून के काले बादल
नाचे बिजली, गरजे अनल

शरद में सुनहरे पत्ते झड़ें
हवा में प्रीत की सुगंध भरे

शीत में बर्फ की सफेद चादर
ठंडी साँसें, मन का आदर

चक्र चलता, समय बहता
जीवन एक अनंत उत्सव कहता