P

युद्ध

कतरा कतरा बिखरा पड़ा है,
मानो बारूद के ढेर पर खड़ा है ।
कहां खेत—खलियान क्या हरियाली ,
पूरा मुल्क ही लाशों से भरा पड़ा है।।
गांव शहर आसमानी इमारतें सब धूल हैं,
मंजर —ए— तबाही, सजा—ए—मौत बन चुके उसूल हैं ।
अहंकार ईर्ष्या प्रभुता पाने की नाकाम कोशिश ,
वसुधैव कुटुंबकम् को न मानना विनाश के पहले की भूल हैं ।।

किसी का सुहाग उजड़ गया ,मानो फूल से कली चली गई
बहन की रक्षा का वादा करने वाली,वो कलाई चली गई ।
अभी—अभी तो संभला था पिता, सहारे की वो लाठी ही चली गई, और ,,
मां की तरस तड़प रही हैं आंखे मानो,रोशनी हमेशा के लिए चली गई ।
सरहद से कैसे आ जाऊं मैं,अपना फर्ज कैसे न निभाऊं मैं ,
देश ने दी है पहचान मुझे ,उसे कैसे खो आऊं मैं ।।
जान भी दे दूंगा मातृभूमि के लिए,वादा कैसे तोड़ आऊं मैं,
तू ही बता मां ,
तेरी कोख से जिस माटी में मैं पड़ा था मैं
उसे संकट में कैसे छोड़ आऊं मैं ।।
युद्ध कैसा भी कहीं भी हो ,विनाश महाविनाश होना ही है
कितने भी शक्तिशाली हो लो तुम ,अपनों को खोना ही है
पीढ़ियों की सीढ़ी एक नही रहती ,न रहता कुछ भी,रोना ही है
आओ प्रण लेकर चलें ,शांति ,एकता का बीज बोना ही है ।।
वसुधैव कुटुंबकम् का पालन कर, सुकून की नींद सोना ही है।।
©pamesh