दहलता है धमाकों से अम्बर और धरती चीख कर पुकारती है..
कि युद्ध रोक दो मानवता हारती है..
वर्चस्व तुम्हारा बढ़ जाए शायद और युद्ध भी तुम जीत जाओगे,
पर आँसू , दर्द जो तुमने दिये क्या उसका हिसाब भी दे पाओगे..
इंसान ही है इंसान का दुश्मन ये इंसानियत को ही मारती है
कि युद्ध रोक दो मानवता हारती है।
....✍🏻 त्रिपुरारी